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शुभ रात्रि: दीवानगी हुस्नसे भीगी ईष्ककी, बयां नहीं होती, पल पल ,ख्वाबोंमे खिले ऐहसासोंसे, उजागर होती, दिल्लगीसे जब ,खिलता,शाम ए रातोंका काफिला, मदहोशीसेही रगोंरगोंमे खिलता,भीगी आरजूका, सिलसिला! ( स्वरचित शायरी)
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Satish Raktawan
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